जब दर्पण में खुद को एक अजनबी सा देखें

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इस व्यस्त जीवन में कभी-कभार आपका सामना ऐसे पलों से होता है जब आप दो मिनट रुक कर सोचने लगते है कि- “मै पहले तो ऐसा नहीं था !” इस तरह का realisation एकदम hit करता है और आप स्तब्ध रह जाते है की कैसे ज़िन्दगी इस पड़ाव पर आ गई है की आप खुद को पहचान नहीं पा रहे है । कितना बदलाव आ चुका है आप के व्यक्तित्व में।

जो बात ध्यान देने वाली बात है की यह बस शांत सा एक बेचैन कर देने वाला अहसास देता है की कहीं- रास्ते में आप बदल गए हैं । और अब सामने खड़े अपने इस संस्करण को लेकर आप निश्चित नहीं हैं कि कैसा फील करें ।

आप अब भी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं, अब भी काम करतें हैं, अब भी जो ज़रूरी है सब करते हैं ।

लेकिन कुछ अन्दर ही अन्दर अनजाना सा लगता है – शायद आप पहले से ज्यादा शांत हो गए हैं । या ज्यादा सख्त हो गए हैं खुद के विचारों को शेयर करने को लेकर । खुले नहीं रहे जितने की हुआ करते थे । जो बातें कभी मायने रखती थीं । अब वैसा असर नहीं करतीं । और जो चीज़ें आप पहले सह लेते थे, अब थका देतीं हैं । कभी-कभी आप उस नरमी को याद करते हैं जो की आपके अन्दर ज़िन्दगी को handle करने को लेकर हुआ करती थी ।

अधिकतर लोग एक रात में नहीं बदलते । वे बदलते हैं – ज़िन्दगी में हो रहे बदलाव के साथ ।

उन निराशाओं के जवाब में जिन्हें महसूस नहीं किया गया । जिन्होंने आपके जीवन का दरवाजा आपकी परिपक्वता से पहले खटका दिया।

उस survival के जवाब में, जिसने ढलने की माँग की ।

आपने व्यावहारिक होना सीखा, जब उम्मीद जोखिम भरी लगी, आपने संयम सीखा जब भावनाएँ असुविधाजनक लगीं आप चलते रहना सीख गए जब रुकना संभव नहीं था ।

और धीरे-धीरे आप जो बनते गये वह सिर्फ आपकी पसंद नहीं- ज़रुरत से भी आकार लेता गया ।

हर ग्रोथ सशक्त नहीं लगती कुछ ग्रोथ ऎसी लगती है:

  • टकराव से बचने के लिए खुद को छोटा करे लेना
  • दूसरों पर भरोसा टूटने के बाद बहुत ज्यादा आत्मनिर्भर हो जाना
  • पहले की अराजकता से बचने के लिए खुद को नियंत्रित कर लेना

बाहर से देखने पर यह परिपक्वता लग सकती है ।

लेकिन भीतर ऐसा महसूस होता है मानो कुछ कोमल सा खामोश हो गया ।

और यही उलझन है- आप दुखी भी नहीं हैं पर पूरी तरह सहज भी नहीं।

दुःख होता है जब यह अहसास होता है –

“मैंने खुद को ऐसा बनाने का तो नहीं सोचा था”

उस शोक में शामिल होता है- आपके भूत में खोने वाली सहजता,वह भावनाएँ जो आपके व्यक्तित्व को आकार देती थीं।

वह व्यक्तित्व जिसमे आप का दूसरों पर भरोसा करना एक सामान्य क्रिया थी।

इस दुःख का मतलब यह नहीं है कि आप पीछे लौटना चाहते हैं, इसका मतलब सिर्फ इतना है कि आप यह देख पा रहे हैं कि इस यात्रा ने आपसे क्या कीमत ली है।

और इस बदलाव को अगर आप समझ और भांप पा रहे हैं तो इसमें ही अपनी छोटी से जीत समझिये।

इस सब में सबसे पहला जो आपका काम था वो था रिअलाईज़ करना कि आपका व्यक्तित्व कैसे बदला है, खुद से यह पूछने का ये मतलब नहीं है की आप अपने पुराने वर्ज़न में वापस जाना चाहते है, आपका यह समझना ज़रूरी है की ज़िन्दगी ही आदमी को परिस्थितियों के साँचो में ढालती चली जाती है और आदमी है कि चुप चाप बिना रिअलाईज़ किये ढलता चला जाता है।

आपको यह ध्यान रखना है की खुद को पुराने रूप में वापस धकेलने की ज़रुरत नहीं है वह व्यक्ति ज़िन्दगी के अलग अध्याय में था, अलग परिस्थितियों में।

जो सवाल आपके अंतर्मन को शांत कर सकते है वे हैं :

मैं अपने किस हिस्से को बचाने की कोशिश करने में लगा हूँ/ लगी हूँ? मेरे कौन से हिस्से उपेक्षित रह गए हैं? मैं क्या बहुत लम्बे समय से उस अतीत वाले व्यक्तितिव को ढो रहा हूँ?

दोबारा जुड़ाव आलोचना से नहीं आता वह जिज्ञासा धैर्य और ईमानदारी से आता है।

आपको बदने का भी अधिकार है और यह सवाल करने का भी कि वह बदलाव आपको कैसा लग रहा है।

अगर आप आज खुद को पहचान नहीं पा रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप खुद को खो चुके हैं।

इसका मतलब यह है कि आप बहुत लम्बे समय से सिर्फ सर्वाइव कर रहे थे , और अब पहली बार आपको ठहर कर देखने की जगह मिली है।

Growth हमेशा और जोड़ने के बारे में नहीं होती।

कभी कभार वह धीरे-धीरे उन चीजों की ओर लौटने के बारे में होती है जिन्हें रास्ते में कुछ समय के लिए अलग कर बैक बेंच पे रख दिया गया था।

अगर इस लेख ने आपके भीतर कुछ चिंतन-मनन को उजागर किया हो, और आपको लगता है बहुत कुछ है जिसके जवाब आपको चाहिए तो आप का स्वागत है हमारे “What’s bothering You?” पर विजिट करने का, या आप हमें हमारे मेल पर भी लिख सकते है – beingpositive74@gmail.com, या पर हमें मेसेज करें @beingpositive74


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Being Positive is a reflective space created for honest conversations around mental well-being, relationships, culture, and the quiet struggles of everyday life. It offers gentle perspectives that encourage self-awareness, emotional balance, and growth without judgement or pressure. Through thoughtful writing, Being Positive aims to remind its readers that healing is personal, progress is gradual, and choosing mental well-being is always a meaningful step forward.

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