
खामोश समय की असहजता
कभी देखा है आपने अपने आप को ख़ामोशी से, दिमाग शांत करके बस “माइंड-फुल” होकर बैठना ?
इस बात की गारेंटी है कि थोडा समय बीतने पर ही मन में कुछ न कुछ स्क्रॉल करने को,
मैसेजे द्वारा वार्ता करने को, या कुछ और करने को लेकर अजीब सी असहजता होने लगती है |
इस सब के साथ विचारों का ताँता लगने लगता है, दबे हुए टॉपिक्स जो की हमेशा ही आपको असहज कर देते हैं,
जिनको आप consciously दिनचर्या एवं टेक्नोलॉजी के ढेर के नीचे दबा कर रखते हो उभर कर आने लगते हैं
भावनाएँ दरवाज़ा खटखटाने लगती है |
ऐसे में हम फिर क्या करते हैं ? खुद को व्यस्त करने के तरीके ढूंढ लेते हैं आलस की वजह से नहीं बल्कि आदत की वजह से |
क्यूँ लगता है खुद के साथ अकेला होना मुश्किल?
हम आजकल ऐसी दुनिया को विटनेस कर रहे हैं जो निरंतर चलते रहने में विश्वास रखती है,
ठहराव जैसे विलुप्त सा हो गया है
हर शांत खाली चीज़ -समय से लेकर भौतिक जगह को शोर भरने में लगा हुआ है हमने टेक्नोलॉजी के
साथ मिलकर ऐसे तरीके इजाद कर दिए है – नोटिफिकेशन, कंटेंट, बातचीत, या किसी न किसी प्रकार का
शोर यहाँ तक कि आराम की परिभाषा भी हमने किसी न किसी स्क्रीन के साथ जोड़ दी है |
धीरे-धीरे हम यह भूल जाते हैं कि खुद को समय कैसे दिया जाता है | हमारे “माइंड” के लिए distraction free
“माइंड-फुल्नेस” एकदम एलियन कांसेप्ट हो गया है |
जब भी ये शोर या “distractions” रुकते है तो जैसे स्थिर पानी में तली दिखने लगती है उसी प्रकार –
वे भावनाएँ जिन्हें हमने महसूस नहीं किया, वे फैसले जिन्हें टालते रहे, हमारे अवचेतन मन की वह
थकान जिसको हम नज़रंदाज़ करते रहे, और खुद का वह हिस्सा जिससे हमने रुककर कभी हालचाल
नहीं पूछा, वह सब एक साथ सामने आ जाते हैं,
फिर लगता है कि मानो स्थिति नर्वस-ब्रेकडाउन की आ गयी हो
यही सब कारण है की सब जानते हुए भी हम ऐसे “distractions” की ओर मुख किये रहते है,
इसी लिए हम अकेले आत्मचिंतन करने से डरते हैं, और इसीलिए कहीं न कहीं
यह पता भी नहीं की खुद के साथ बैठा भी जाये तो कैसे |
समस्या हमारे distractions नहीं है, समस्या है ऐसे distractions का स्तेमाल कर हमारा अपने आप से भागना
यह सब अपने आप में गलत नहीं है, सभी को ब्रेक चाहिए पर-
जब हर शांत पल असहनीय लगने लगे तो वह अक्सर किसी गहरी बात की ओर इशारा करता है
हम खुदको व्यस्त कर लेते हैं ताकि-
असहज सोच से बच सकें, अंतर्मन में खुद पर उठते सवालों को चुप करा सकें,
भावनात्मक भारीपन से भाग सकें, उन फैसलों को टाल सकें जिनका सामना करने के लिए हम तैयार नहीं हैं
हम इस सब में यह रिअलाईज़ नहीं करते कि इस तरीके से, हम खुद के साथ अनजाने में कितना अन्याय कर रहे होते हैं,
शुरुआत में distractions की कीमत साफ़ नहीं दिखती |
वह धीरे-धीरे सामने आती हैं- बेचैनी के रूप में, चिंता के रूप में,
या अपनी ही जिंदगी से अजीब-सी दूरी के रूप में |
क्या होता है जब हम खुद के नहीं बैठते
जब हम हमेशा व्यस्त रहते हैं, तो हमारे अंतर्मन के द्वारा दिए जाने वाले सूक्ष्म संकेत छूट जाते हैं,
शरीर की थकान, दिमाग की उलझन,दिल की अधूरी जरूरतें आदि |
खुद के साथ बैठना हर चीज़ सुलझाने के लिए नहीं होता बल्कि
यह सुनने के लिए होता है -आपके खुद के अंतर्मन की |
कैसे समय दे अपने आप को?
खुद के साथ बैठने का मतलब ना तो जबरदस्ती की ख़ामोशी धारण करना है,
और न ही अपने मन में मौजूद गुत्थियों को एक साथ सुलझाने की कोशिश करना|
इसका मतलब है, आपके व्यस्त दिनचर्या में छोटे-छोटे पल की मौजूदगी-
बिना किसी स्क्रीन के, हेडफोन के बिना टहलना | चाय या कॉफ़ी का कप चुप चाप शांति से बैठना |
शुरुआत में ये सारा करना असहज लग सकता है, और माने हमारी तो ये रिएक्शन बिलकुल सामान्य है |
असहजता का मतलब ये नहीं है कि कुछ गलत है- बल्कि ये संकेत है कि कुछ ऐसा महसूस किया जा रहा है जो कि नया है |
हर सोच का विश्लेषण ज़रूरी नहीं है, बस उस पल में आपका मौजूद रहना ज़रूरी है|
कैसे करें शुरुआत
अगर खुद के साथ बैठना मुश्किल लगता है, तो शुरुआत थोड़े से समय के साथ करें |
याद रखे लम्बी ख़ामोशी नहीं, छोटे-छोटे “pauses” है जो कि आपके अवचेतन मन को “rewire” करने में मदद करेंगे |
दो-पाँच मिनट काफी है, बस सचेत होकर साँस ले | जो विचार दिमाग में आये -उसे बस नोटिस करें,
विश्लेक्षण नहीं करना है | हर हीलिंग एवं ग्रोथ समय मांगती है |
खुद से सवाल पूछिए- “मै क्या महसूस कर रहा/ रही हूँ ? न कि- “मुझमे क्या गलत है?”
आपके Distractions आपका ध्यान खीच ले जाएँ तो निराश होकर कोसना नहीं है, नरमी से ध्यान को वापस लाइए |
धीरे-धीरे ये खुद के साथ बैठने की activity आपके अवचेतन मन की गुत्थियों को सुलझाने में काफी कारगर साबित होगी |
आपके द्वारा किये गए ये changes और भविष्य
खुद के साथ बैठना, खुद को समय देना किसी प्रकार के अनुशासन का पाठ नहीं है,
यह खुद से रिश्ते की बात है |
अपने विचारों से, अपनी भावनाओं से, अपनी भीतर की ज़िन्दगी से एक रिश्ता-
जिस पर हर समय भागने के सिलसिले को लगाम लगाई जा सके |
अगर उक्त सारा कुछ आपको किसी प्रकार छुआ है, सोचने पर आपको मजबूर किया है तो फीडबैक में हमें ज़रूर बताएं |
यदि इस सब से सम्बंधित कोई भी घटनाक्रम है ज़िन्दगी का जिससे आप की mental peace भंग हो रही है
तो हमारे “अपना संघर्ष साझा करें” वाले section में जाकर हमें लिख सकते है, या सीधे मेल कर सकते है – beingpositive74@gmail.com पर |
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