
कुछ दोस्तियाँ झगड़ों से खत्म नहीं होती हैं
हम सब के जीवन मे कुछ एसी दोस्तियाँ होती है जो कि –
किसी बहस के साथ नहीं टूटतीं।
कोई झगड़ा नहीं होता।
कोई तीखे शब्द नहीं कहे जाते।
कोई ऐसा पल नहीं आता जिसे आप उँगली रखकर कह सकें—
“बस यहीं से सब बदल गया।”
वे बस…
धीरे-धीरे धूमिल होती जाती हैं।
मैसेज, कॉल कम होने लगते हैं। मुलाक़ातो के प्लान टलते रहते हैं,
फिर एक समय आता है कि वो उनकी यादें धूमिल होकर खत्म हो जाती हैं।
धीरे धीरे किसी को खो देने की ख़ामोश उलझन
जब दोस्ती चुपचाप फीकी पड़ती है,
तो उसके साथ एक अजीब-सी बेचैनी आती है।
कोई closure नहीं, कोई वजह नहीं।
बस एक दूरी,
जो बिना पूछे बढ़ती चली जाती है।
आप पुरानी बातों को दोहराते रहते हैं—
सोचते हैं,
कहीं कुछ छूट तो नहीं गया?
कहीं मैंने कुछ गलत तो नहीं कहा?
और फिर यह उलझन भी रहती है—
क्या मुझे दुखी होने का हक़ है,
जब कुछ “गलत” हुआ ही नहीं?
लेकिन सच यह है—
दर्द को असली होने के लिए ड्रामे की ज़रूरत नहीं होती।
किसी भी दोस्ती का ऐसा अंत अलग तरह से क्यों चुभता है ?
जो दोस्तियाँ बिना टकराव के खत्म होती हैं,
वे अपने पीछे सवाल छोड़ जाती हैं।
आपसे बोलकर नाता नहीं तोड़ा गया—
पर फिर आपका हाथ थामा भी नहीं गया।
परवाह थी— पर इतनी नहीं कि रिश्ता संभाला जा सके।
ऐसे अंत के साथ क्या किया जाए, समझ नहीं आता।
ऐसी दोस्ती अधूरी कहानियों की तरह रह जाती है,
जिसकी याद वक्त के साथ धूमिल होती जाती है,
माफियों का सिलसिला स्टार्ट ही नहीं होता कि,
स्वीकार करने या न करने की स्टेज तक पहुचा जाए।
वक्त के साथ बस उस दोस्त की एक खाली जगह रह जाती है
जहाँ कभी नज़दीकी हुआ करती थी।
कैसे ज़िंदगी चुपचाप लोगों को अलग कर देती है
अक्सर फीकी पड़ती दोस्तियाँ
धोखे या झगड़ों की वजह से नहीं टूटतीं।
वे आकार लेती हैं—
बदलती प्राथमिकताओं से
ज़िंदगी के अलग-अलग पड़ावों से
भावनात्मक थकान से
और उस विकास से
जो एक ही दिशा में नहीं होता
जैसे-जैसे लोग बदलते हैं,
वह जगह जहाँ कभी रिश्ता फिट बैठता था,
वह भी छोटी पड़ने लगती है।
और सच का सामना करने के बजाय,
लोग दूर होते चले जाते हैं—
उम्मीद करते हुए कि
दूरी वो कह देगी
जो शब्द नहीं कह पाए।
बढ़ते फासले का अनकहा शोक
किसी ऐसे इंसान को खोना
जो इस दुनिया मे कही तो अपना जीवन जी रहा है,
लेकिन वो आपके साथ मौजूद नहीं है—
उसमें एक अलग तरह की उदासी होती है।
आप उस इंसान को नहीं,
बल्कि उस शख्सियत को मिस करते हैं
जो उस दोस्ती में आप थे।
वो सहजता।
वो साझा समझ।
बिना समझाए समझे जाने का एहसास।
और क्योंकि कोई साफ़ अंत नहीं था,
तो यह दुख भी चुपचाप दिमाग के किसी कोने मे बना रहता है—
कभी-कभी ऐसे ही बड़ी नोस्टालजिया के साथ अचानक लौट आता है।
और फिर होता है दर्द, बिल्कुल ठीक वैसे ही जैसे कोई पुरानी चोट वापस उभर आई हो।
ऐसे मे हमे ये जरूर ध्यान रखना है कि यह मानसिक प्रतिक्रिया बिल्कुल नॉर्मल है,
यही वो चीजें है जो इंसान को इंसान बनाती हैं
ख़ामोश विदाइयों के साथ शांति बनाना
हर दोस्ती का हमेशा चलना ज़रूरी नहीं होता।
और इसका मतलब यह नहीं कि
उसकी अहमियत कम थी।
अगर कोई दोस्ती बिना झगड़े के फीकी पड़ गई है,
तो—
अपने नुकसान को कम से कम दिल और दिमाग मे रजिस्टर तो होने की इजाज़त दीजिए,
भले ही वह स्पष्ट न हो, हर बदलाव की वजह ढूँढना ज़रूरी नहीं—
कुछ बदलाव वजह नहीं बताते
जो मिला, उसके लिए आभार रखें,
लेकिन उसे ज़बरदस्ती थामे न रखें
उन रिश्तों के लिए जगह बनाइए
जो आज के आपके साथ बढ़ सकें।
छोड़ना,
बीती हुई यादों को मिटाना या खराब करना नहीं है।
यह आगे बढ़ने की अनुमति देना है—
बिना कड़वाहट के। वो अंग्रेजी मे अक्सर कहते है न :
“It just didn’t work out”
आगे का क्या फिर ?
कभी-कभी दोस्तियाँ इसलिए खत्म नहीं होतीं
क्योंकि कुछ गलत हो गया—
बल्कि इसलिए कि कुछ बदल गया।
और अगर आप भी किसी ऐसी दोस्ती का बोझ
चुपचाप ढो रहे हैं जिसे कभी सही तरह से अलविदा नहीं कहा गया—
तो आपको यह अकेला महसूस करने या अपने आप को ब्लेम करने की ज़रूरत नहीं है।
आप हमारे “What’s Bothering You?” सेक्शन में जाकर
अपने मन की बात लिख सकते हैं। या सीधे beingpositive74@gmail.com
पर हमें ई-मेल लिख सकते हैं।
हम हर संदेश पढ़ते हैं। और जब आप तैयार हों,
हम आपसे जुड़ेंगे—गर्मजोशी के साथ,
बिना किसी जजमेंट के।
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